ब्रिक्स सम्मेलन और बहु ध्रुवीय होती दुनिया

ब्राजील की राजधानी रीओडिजनरो (व्रीसीलिया), में ब्रिक्स देशों का 17वां शिखर सम्मेलन संपन्न हो गया है। सम्मेलन के बाद एक घोषणा पत्र जारी किया गया है। अगर घोषणा पत्र को गहराई से देखा जाए तो स्पष्ट है कि यह पश्चिम के नेतृत्व में चल रही एक ध्रुवीय दुनिया के कारण पैदा हुए अंतर विरोधों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। जिससे लंबे समय से विकास अल मुल्क जूझ रहे हैं।

इस समय जिस तरह से ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका द्वारा दुनिया को धमकाते डराते और अपने हितों के अनुकूल विश्व व्यवस्था को नियोजित करने की खतरनाक कोशिश चल रही है। उसने विश्व के पिछड़े विकासशील देशों की आशंका और चिंता को और बढ़ा दिया है। ब्रिक्स में शामिल देश की स्वतंत्रता और स्वायत्तता की चिंता को शिखर सम्मेलन में स्वर देने का काम हुआ है।

इस सदी की शुरुआत में 2006 में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री गोल्डमैन सैक्स ने विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर आने का सुझाव दिया। उनके विचार के अनुसार उस समय चार बड़ी अर्थव्यवस्थाएं दुनिया में आकार ग्रहण कर रही थीं। जिसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन थे। उस समय लैटिन अमेरिका के ब्राजील में वामपंथी राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा चुनकर आए थे। उन्होंने ब्रिक के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ब्रिक का प्रारंभिक लक्ष्य था आपसी सहयोग समझ और समन्वय के साथ पश्चिम नियंत्रित दुनिया में विकासशील देशों के हितों के लिए काम करना। 1909  मैं ब्रिक की स्थापना हुई। जिसका प्रथम सम्मेलन रूस के शहर यकातिरेनवर्ग में हुआ। जिसमें रूस, चीन, ब्राजील और भारत के राष्ट्राध्यक्ष क्रमश: दिमित्री मेदवेदेव,  हू जिन ताओ, लूला डिसिल्वा और डॉक्टर मनमोहन सिंह शामिल हुए थे। बाद में 2010 में साउथ अफ्रीका के ब्रिक में शामिल हो जाने के बाद इसका नाम ब्रिक्स हो गया। 

ब्रिक्स में नए राष्ट्रों के शामिल होने और ब्रिक्स देशों की विकास दर के तीव्र रहने के कारण ब्रिक्स का अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में महत्व बढ़ गया है।इसे वर्तमान समय में ग्लोबल साउथ कहा जाने लगा है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका के नेतृत्व में दुनिया में नाटो के अलावा अनेक क्षेत्रीय सहयोग संगठन बने हैं। जो मूलत: सैन्य संगठन थे। जिन्होंने पश्चिमी दुनिया के पक्ष में वैश्विक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 एक समय के उपनिवेश रह चुके देश समय के साथ विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ने लगे। अमेरिकी रणनीति के तहत उदारीकरण यानी एलपीजी की नीतियां  विकास शील देशों पर थोपी गई। मुनाफे की क्रू योजना के साथ वित्तीय पूंजी तेजी से इन देशों की तरफ पलायन करने लगी। प्राकृतिक संपदा और सस्ता मानव श्रम की प्रचुरता के कारण इन मुल्कों को 1991 के बाद क्रूरता पूर्वक लूटा गया। जिस तरह से उपनिवेश कालीन लूट की प्रतिक्रिया से उपनिवेशों में स्वतंत्रता संघर्ष शुरू हुए थे। शायद इतिहास पुनः दोहराने जा रहा है। 

उदारीकरण के बाद विकासशील मुल्कों में उत्पादकता तकनीकी विकास और औद्योगिक ढांचा के निर्माण का नया रास्ता खुल गया। जिससे चीन साउथ पूर्व एशिया भारतीय उपमहाद्वीप लैटिन अमेरिका में ब्राजील, अर्जेंटीना, चिली और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों को नए सिरे से उठ खड़ा होने में मदद मिली।

जिसका परिणाम हुआ कि बड़े-बड़े कारपोरेट घराने पश्चिमी जगत से बाहर निकलकर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की तरफ कूच कर गए। इसका केंद्रीय क्षेत्र चीन सहित दक्षिणी पूर्व एशिया बना। जिसमें दक्षिण कोरिया, ताइवान,  वियतनाम, बांग्लादेश, चीन शामिल हैं। इसी तरह लैटिन अमेरिका में नव उपनिवेशवाद विरोधी लहर उठने लगी। जिससे ब्राज़ील सहित कई देशों में तेजी से औद्योगिक विकास हुआ। हृयूगो शावेज इस दौर के नायक बने। साथ ही अमेरिकी प्रभुत्व को भी चुनौती मिलने लगी। इस लहर का आगाज अफ्रीकी देशों में शुरू हो चुका है। क्या उदारवाद (एलपीजी) पलट कर अपने ही प्रणेताओं पर वार करने लगा है। 

उदारीकरण के चलते उपभोक्ता सामानों के उत्पादन करने वाली कंपनियां पश्चिमी दुनिया से निकलकर ग्लोबल साउथ आई। पश्चिम की विकास की गति तेजी से गिरने लगी है। इस अमेरिका सहित पश्चिम देशों की वार्षिक विकास दर नकारात्मक जा रही है। G7 के किसी भी देश की जीडीपी विकास दर दशमलव में है। कनाडा को छोड़कर कोई भी G7 का देश एक प्रतिशत विकास दर नहीं दर्ज कर पा रहा। यूरोप सहित अमेरिका और कनाडा जैसे विकसित देशों के विकास का पहिया जाम हो गई है।

ठीक इसी समय चीन सहित साउथ ग्लोबल आज में एक बड़ी आर्थिक ताकत बनने की तरफ अग्रसर है। साउथ ग्लोबल की औसत विकास दर चार प्रतिशत के आस-पास है। भारत सहित कुछ देश तो 7% से ऊपर वार्षिक विकास दर दर्ज कर रहे हैं।

दूसरी तरह विश्व के सकल जीडीपी में G7 के देशों की हिस्सेदारी 44% से घटकर 30 के आसपास आ गई है। जो लगातार ढलान पर है। वहीं ब्रिक्स देशों ने तेजी से वृद्धि दर्ज करते हुए सकल वैश्विक जीडीपी में अपनी हिस्सेदारी 40% के पार कर ली है। इसलिए इन मुल्कों के इकट्ठा होने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। जैसे शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन (sco) सार्क और ब्रिक्स हैं। इन संगठनों में ब्रिक्स के देश नियमित आपसी संपर्क में रहते हैं। प्रतिवर्ष ब्रिक्स का सम्मेलन होता है। इस सम्मलेन में संबद्ध देशों के बीच व्यापर और आर्थिक राजनीतिक सामाजिक सवालों को लेकर  विचार विमर्श होता है। सम्मेलन एक घोषणा पत्र स्वीकार करता है। जो आपसी सहमति के आधार पर तैयार होता है।

 1991 में सोवियत ब्लॉक के विघटन के बाद दुनिया का नेतृत्व अमेरिका के हाथ में आ गया था।अमेरिका और उसके सहयोगी नाटो के देश अपनी राजनीतिक आर्थिक जरूरतों के अनुसार विश्व भर की घटनाओं को नियंत्रित संचालित करने लगे ।यही नहीं द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को जैसे यूएनओ, विश्व बैंक, आईएमएफ,  डब्ल्यूटीओ, यूएन सिक्योरिटी काउंसिल आदि का इस्तेमाल अमेरिका और नाटो मनमाने तौर पर करने लगे हैं। महाबली अमेरिका ने इन संस्थाओं का अपहरण कर लिया और इन्हें अपने वैश्विक साम्राज्य के विस्तार व लूट के लिए खुले तौर पर प्रयोग करने लगा। जिससे विकासशील देशों के साथ पश्चिम के अंतर विरोध समय-समय पर उभरते रहे। 

आम तौर से विगत 80 वर्षों से और खास तौर से पिछले 35 वर्षों से अमेरिका मनमाने तौर पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का इस्तेमाल कर रहा है। इसका जीता जागता उदाहरण इराक, लीबिया, मिस्र, अफगानिस्तान, फिलिस्तीन सहित कई देशों पर युद्ध थोपना सरकारों को गिराना बनाना और रूस ईरान दक्षिण कोरिया आदि पर मनमाने तौर पर प्रतिबंध लादने के रूप में देखा जा सकता है। 

आम तौर से 20वीं सदी के 55 वर्ष और खास तौर से 21वीं सदी के प्रथम चौथाई के इतिहास को अमेरिका द्वारा नाटो को आगे करके विश्व के अनेक विकासशील और पिछड़े देशों को धमकाने डराने सरकारें गिरने बनाने लूटने और तरह तरह के प्रतिबंध ठोकने के रूप में याद किया जाएगा। खैर अमेरिका के नेतृत्व में विश्व जन गण के त्रासद अनुभव को यहीं छोड़ते हैं।

एक तथ्य यहां ध्यान देने का है कि रूस को छोड़कर ब्रिक्स में शामिल अधिकांश देश पश्चिम के उपनिवेश रहे हैं। पश्चिम ने इन्हें लूटा है और इन पर जुल्म ढाया है। संसाधनों की लूट की है और वहां के सामाजिक सांस्कृतिक वातावरण से लेकर पर्यावरण तक को प्रदूषित किया है। जिसकी कीमत करोड़ों नागरिकों को चुकानी पड़ी थी और आज भी चुकानी पड़ रही है। प्रत्यक्ष उपनिवेश का युग खत्म हो जाने के बावजूद लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, एशिया के अधिकांश देश अमेरिका के उपनिवेश बने हुए हैं। आज भी इन देशों की सरकारों और वहां का राजनीतिक नेतृत्व अमेरिका परस्त है। इसे हम अरब मुल्कों से लेकर अफ्रीका लैटिन अमेरिका और एशियाई देशों के राजनीतिक नेतृत्व के वर्ग चरित्र को देखकर समझ सकते हैं। 

 इसलिए 21वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका का पिछवाड़ा कहा जाने वाला लैटिन अमेरिका में ही सबसे पहले नव उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन वर्ल्ड सोशल फोरम के ऊभार में देखा गया। WSF में उदारवादी नीतियों के प्रति आक्रोश था। एलपीजी और नव उपनिवेशवाद की विसंगतियों को लेकर सचेत दृष्टि थी। लेकिन इसमें सरकारों और राष्ट्रों को जोड़ने की क्षमता नहीं थी। यह आंदोलन नई दुनिया को संभव बनाने की आकांक्षा के साथ आगे बढ़ा। इसके सम्मेलनों में लाखों की भीड़ जुटती थी।

WSF मूलतः गैर सरकारी संगठनों एनजीओ उदारवादी बुद्धिजीवियों और प्रगतिशील सामाजिक कार्यकर्ताओं का समागम  बनकर रह गया। जो वैकल्पिक आर्थिक राजनीतिक सामाजिक दृष्टि न विकसित कर‌ पाने  के कारण धीरे-धीरे निष्प्रभावी हो गया। इसी दौर में आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिका के नेतृत्व में युद्ध छेड़ दिया गया।जिसका वैचारिक विकल्प वर्ल्ड सोशल फोरम के पास नहीं था। जिस कारण एक उदारवादी संभावना धीरे-धीरे विलुप्त हो गई।

21वीं सदी के पहले दशक के आखिर तक आते-आते ग्लोबल साउथ आर्थिक राजनीतिक ताकत बनने लगा था। इसलिए पश्चिम के वर्चस्व के खिलाफ विकासशील देशों में आघोषित रूप से राजनीतिक आर्थिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए संगठित होने के लक्षण दिखाई देने लगे। इसकी शुरुआत ब्राज़ील से हुई। जहां चार देशों ने मिलकर ब्रिक का निर्माण किया। जो आज ब्रिक्स के नाम से जाना जाता है। लगभग एक दर्जन देशों के एक साथ आ जाने के बाद ब्रिक्स महत्वपूर्ण मंच बन गया है। जिसका 6 -7 जुलाई को ब्राजील में 17 वां अधिवेशन हुआ है।जिसको लेकर अमेरिका हमलावर है।

ब्रिक्स के देश के प्रति अमेरिकी व्यवहार में तल्खी के क्या मायने हैं। स्पष्ट है कि विगत तीन सदियों से यूरोप और 80 वर्षों से अमेरिका पश्चिम से लेकर पूर्व तक के देशों के संसाधनों को लूट रहे हैं। ये देश आज भी पश्चिम के नव उपनिवेश बने हुए हैं। इन देशों का अमेरिकी छतरी से अलग होकर संगठित होना पश्चिम के लिए खतरे की घंटी है।

हम जानते हैं कि शीत युद्ध काल में लैटिन अमेरिका और दक्षिण पश्चिम एशिया के इस्लामिक देश ही वह बड़ी दीवार थे। जिनकी आड़ लेकर अमेरिका ने शीत युद्ध पर विजय पाई थी। अमेरिका के नेतृत्व में सैकड़ों युद्ध अभियान चले। दर्जनों सरकारों को गिराकर सैन्य तानाशाही से लेकर धार्मिक तानाशाही वाली कट्टरपंथी सरकारें बनाई गईं। लोकतंत्र के लिए साम्यवादी खतरे के नाम पर इन सरकारों को संरक्षण दिया गया। आज ग्लोबल साउथ के देश इन्हीं स्थितियों के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं। तो अमेरिका के लिए चिंतित होना स्वाभाविक है। साम्यवादी खतरे के टलने के बाद अब अमेरिका को एक नए तरह का खतरा दिखाई दे‌ रहा है। इसलिए ट्रंप बौखला गए हैं और वह ब्रिक्स में शामिल हो रहे देशों को दंडित करने के लिए तरह-तरह की धमकियां दे रहे हैं।

यही कारण है कि रियो डीजनेरियो सम्मेलन में ग्रहण किए गए 8 प्रस्तावों पर नजर डालने की जरूरत है। जिसके द्वारा भविष्य में विभिन्न देशों के बीच के अंतर संबंधों को नए तरह से परिभाषित करने की कोशिश की गई है।

एक- यूनीलेटरल टैरिफ लागू करने के तरीके (एकतरफा) को गलत कहा गया है और इसे वैश्विक ट्रेड व्यवस्था के लिए खतरनाक माना जा रहा है। इसलिए बाई लैटरल ट्रेड प्रणाली स्वीकार को स्वीकार किया गया है।

दो-एक तरफा प्रतिबंध (सैंक्शन) को अंतरराष्ट्रीय दादागिरी माना गया। पेट्रोल, मैनपावर, फ़ूड सिक्योरिटी आदि के क्षेत्र पर एक तरफ फ्री ट्रेड ब्रिक्स के देशों पर थोपा जा रहा है। रूस-ईरान आदि पर आवश्यक रूप से सैंक्शन लगा दिया गया। 

तीन -आपसी कारोबार या इंटरनेशनल ट्रेड स्थानीय मुद्राओं में करने का फैसला। यानी ब्रिक्स के देश अल्टरनेटिव करेंसी पर विचार कर रहे हैं। ब्रिक्स का कहना है कि इसे डॉलर के वर्चस्व के खिलाफ न समझा जाए। (जहां पहले डॉलर में 89% वेश या कारोबार होता था अब वह घटकर 67% पर आ गया है।)

चार- इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले की निंदा की गई। इजराइल को हमलावर माना गया और गाजा क्षेत्र को फिलिस्तीन भूभाग के रूप में मान्यता में दी गई। फिलिस्तीन यानी हमास के संघर्ष को डेमोक्रेटिक रेजिस्टेंस कहा गया।

पांच- क्लाइमेट चेंज पर पश्चिम द्वारा पिछड़े देशों पर डाली जा रही जिम्मेदारी को अस्वीकार किया गया। अमेरिका द्वारा क्लाइमेट संकट के लिए विकासशील देशों को दोषी ठहरने का विरोध और ट्रंप द्वारा पर्यावरण चेंज की जिम्मेदारियां से पीछे हटने को की निंदा की गई। प्रति व्यक्ति के आधार पर क्लाइमेट रेस्पांसिबिलिटी को नकार दिया गया। जिसे अमेरिका और पश्चिम विकासशील देशों पर थोपना चाहते हैं।अमेरिका से क्लाइमेट चेंज के सवाल पर जिम्मेदारी निभाने की मांग की गई।

छह -वैश्विक ग्लोबल गवर्नेंस के सवाल पर रिफॉर्म की मांग की गई। वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ, विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं को और ज्यादा पारदर्शी तथा पश्चिम के दबाव से मुक्त करने की मांग उठी। 

सात-सुरक्षा परिषद में सुधार। भारत-ब्राजील जैसे देशों को सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यता की वकालत की गई। यानि सुरक्षा परिषद के दायरे को बढ़ाने की बात उठी। जिससे साउथ ग्लोबल का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सके। यह बैलेंस ऑफ पावर का सवाल। जिसे दुरुस्त किया जाना चाहिए।

आठ-बाजार और ट्रेड डील को हथियार के रूप में प्रयोग करने का विरोध।(विपेनेनाइजेशन का मार्केट।)

ब्राजील में हुए 17 वें ब्रिक्स सम्मेलन के प्रस्ताव पर अमेरिका और पश्चिम के देश  नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं। ट्रंप तो ब्रिक्स के देशों पर टैरिफ बढ़ाने की धमकी देने लगे हैं। राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के तुरंत बाद ट्रंप ने ब्रिक्स के खत्म हो जाने का ऐलान किया था। लेकिन ब्रिक्स के 17 वें सम्मेलन ने ट्रंप की चिंता बढ़ा दी है।

यहां ध्यान देने की बात यह है कि ब्रिक्स में शामिल सभी 10 देशों की जनसंख्या 3.4 बिलियन के साथ दुनिया की आबादी की कुल 45% के है। साथ ही ब्रिक्स देशों का विश्व जीडीपी में भागीदारी बढ़ती जा रही है। मैन्युफैक्चरिंग कृषि इलेक्ट्रिक व्हीकल उपभोक्ता सामानों के उत्पादन में ग्लोबल साउथ पश्चिम को पीछे छोड़ दिया है। ब्रिक्स में डाटा एआई तथा हेल्थ फॉरेन ट्रेड इकोनामी आज में हिस्सेदारी की मांग भी उठी है। 

ब्रिक्स में अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए क्लाइमेट चेंज के क्षेत्र में चीन और यूएई ने पैसा लगाने का प्रस्ताव रखा है। इसी के साथ न्यू डेवलपमेंट बैंक खड़ा करने का भी निर्णय लिया है। 

कुल मिलाकर कहा जाए तो ब्रिक्स और अधिक समावेशी न्याय संगत व्यवस्था के लिए एकजुट है। वैश्विक दक्षिण सहयोग अधिक समावेशी और सतत शासन हेतु मजबूत बनाने की दिशा में केंद्रित है। संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक शासन प्रणालियों में तत्काल सुधार की मांग के साथ संयुक्त राष्ट्र में अफ्रीका एशिया लैटिन अमेरिका के उभरते देशों की भागीदारी, यूएन सुरक्षा परिषद में अधिक सक्रिय भूमिका की जरूरत पर जोर दिया गया। विश्व में हथियारों पर बढ़ रहे खर्चे और युद्धों व टकरावों में वृद्धि पर चिंता व्यक्त की गई। जलवायु परिवर्तन के लिए बहु पक्षीय प्रयास की मांग घोषणा पत्र मे उठाई गई है। अंत में स्टेट पावर ब्रिक्स इकोनॉमिक पार्टनरशिप – 2025 का स्वागत किया गया।

आज भी ब्रिक्स में शामिल कई देश अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध में बधें हैं। जहां अमेरिकी सैनिक अड्डे हैं तथा उसके साथ अमेरिका के घनिष्ठ रणनीतिक रिश्ते हैं। निश्चय ही इन देशों पर अमेरिकी दबाव बढ़ेगा और यहां के सत्ताधारी किसी खास मंजिल में ब्रिक्स के लिए चुनौती भी बन सकते हैं। रीयोडीजनरो सम्मेलन में शामिल विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष इस चुनौती और जटिलता को अवश्य समझ रहे होंगे। वस्तुत: ब्रिक्स के इस सम्मेलन को पश्चिम विरोधी अवधारणा पर खड़े होकर नहीं देखा जाना चाहिए। 

17 वें समिट में स्वीकार किए गए घोषणा पत्र को ग्लोबल साउथ में उभर रही नई आर्थिक राजनीतिक सामाजिक शक्तियों की आकांक्षा को प्रतिनिधित्व देने के एक प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। यही कारण है कि सभी 10 देश के राष्ट्राध्यक्षों और प्रतिनिधियों ने इसी भावना के अनुरूप ही बहुत सधे कदमों से आगे बढ़ने का फैसला लिया है।

इस तरह ब्राजील की राजधानी रीयोडिजनरो में हुए 17वें ब्रिक्स‌ सम्मेलन में पश्चिम के वर्चस्व के खिलाफ विकासशील देशों में उठ रही जन भावनाओं को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास हुआ है। जिसे स्वागत योग्य कदम माना जाना चाहिए। एक बहुध्रुवीय समावेशी शांतिपूर्ण स्वतंत्र लोकतांत्रिक ‌दुनिया के निर्माण की दिशा में यह प्रयास भविष्य में सकारात्मक भूमिका निभाएगा।

(जयप्रकाश नारायण वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।)

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